ठहरता वक्त , बोलती यादें
ठहरता वक्त , बोलती यादें
यादें कभी-कभी इतनी गहरी होती हैं,
कि वक़़्त भी ठहर-सा जाता है,
साँसोंके दरमियान कहीं बीता
हर पल लौट आता है।
यादों की वो भीगी सी किताब,
हर पन्ना राज़ सुनाता है,
खामोशी की हल्की आहट में,
दिल फिर से मुस्कुराता है।
कभी यूँ तन्हा बैठते हैं जब,
तो यादों का मेला लग जाता है
हर चेहरा, हर बीता लम्हा,
आँखों में दीप-सा जगमगाता है।
कुछ मुस्कान बनके खिलती हैं,
कुछ चुभती हैं जैसे टीस,
इनमें ही छुपा है जीने का रंग,
इनमें ही अधूरी-सी प्यास और रीस।
ना आवाज़ कोई, ना कोई कदम,
फिर भी सब पास लगे,
इन यादों की खामोश दुनिया में,
हम खुद से भी खास लगे।
और जब रात गहराने लगती है,
तो ये और करीब आ जातीहैं,
चाँदनी सें भीगी इन यादों की परछाइयाँ,
दिल को चुपके से सहला जाती हैं।
Neena Ghai
