सपनों और हकीकत के बीच,
सपनों और हकीकत के बीच,
सपनों और हकीकत के बीच,
हमारा दिल अक्सर खो जाता है,
एक तरफ़ ख्वाहिशों का आसमान.
दूजी तरफ़ सच झुकाता है।
कभी जो अपना सा लगता था.
वो भी अजनबी हो जाता है,
सपनों का शहर बसते-बसते
हकीकत में बिखर जाता है।
हम मुस्कुराते तो रहते हैं
पर अदर कुछ टूट जाता है,
इन दो दनियाओं के बीच इंसान
कहीं छट जाता है।
कभी ख्वाबों की रोशनी में
अपना ही साया धंधला पड जाता है,
जिन राहों पर दिल चला था
कभी वहीं हर कदम बहक जाता है।
न मंजिल का पता रहता है,
न सफ़र ही अपना लगता है,
सपनों और हकीकत के डस फ़ासले में
इंसान खूद से ही खो जाता है।
Neena Ghai
