त्रिभंगी छंद...
त्रिभंगी छंद...
त्रिभंगी छंद (244,44,44,42)
जय जय गणनायक,
सुख के दायक,सेवा से हो,कष्ट परे ।
हे नित निर्णायक,
सत के गायक, पुण्य रहे अब ,पाप मरे ।।
तुम ही संहारक,
भक्तन तारक,सुमिरन करके,कष्ट हरे ।
तुम पूजन लायक,
नित प्रतिपालक,जय-जय-जय प्रभु,गान करे ।।
जय अतुलित बलवन्,
हिय आह्लादन,मारुत प्रचलन,हे स्वामी ।
हो नित अनुशीलन,
उर उद्वेलन,सत संचालन,दो हामी ।।
कर मम प्रतिपालन,
हो वह लालन,सत्य प्रक्षालन,तुम नामी ।
मति महती मचलन,
नौका चालन,करती दोलन,पथ गामी ।।
ज्यों पतझड़ सावन,
अंतिम निरसन,जीवन हो अब,निष्कामी ।
हो हिय अतिभावन,
सम वृंदावन,दे दो सत्पथ,आगामी ।।
द्यौ जैसे पावन,
नव सुत यौवन, लक्षित यापन,आयामी ।
शुभ मन का धावन,
जीकर जीवन,जा रे नभचर,उड़ व्योमी ।।
