STORYMIRROR

Kavita Yadav

Inspirational

3  

Kavita Yadav

Inspirational

तनख्वाह....

तनख्वाह....

1 min
346


महीने के अंत में कुछ कागज जैसी कुछ आती

अम्मा जिसको बाबा की तनख्वाह बताती

कितना बाबा संघर्ष

उस कागज जैसी तनख्वाह कमाने में

अम्मा भी महीने के खर्च से खूब लड़ती

उस तन्ख्वाह को बचाने में

कहते हैं ..पैसे खुशियाँ नहीं देते है पर क्या यह सच है

बिन पैसे के तो किसी के सर के ऊपर न ही छत है


बीमार की बीमारी दवा में तभी तबदील होती है

जब जेब की औषधि रूपी पैसे हो...

बेटी बोझ नहीं

पर उसकी विदाई इतनी भी सरल नहीं....

महीने की तनख्वाह में सिमट में रह जाता किसी का बचपन

तो किसी के सपने में भी अड़चन लाता है यह बचपन....

पिता के मौन में भी एक जिक्र और न चाहते हुए वाली फिक्र है तनख्वाह

औलाद की ख्वाहिश पूरी करने की एक रास्ता है तनख्वाह

बेटी की बिदाई का बोझ संभालने का नाम भी है तनख्वाह 

और कुछ बचे तो बुढ़ापे की लाठी है तनख्वाह


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational