वो और साड़ी
वो और साड़ी
जब साडी पहन कर आती है तो बड़ी अच्छी लगती है...
मेरी माँ की बिल्कुल परछाई लगती है....
हाथो में कंगन भी पहनती है...
और फिर बिल्कुल माँ की याद दिलाती है...
बालों में गजरा लगती है..
जिसकी खुशबू से पूरा घर महकती है...
आँखो की हया को छुपाने के लिए...
आँखो में काजल लगाती है..
चाँद में भी दाग है.....
शायद इसी लिए माथे पर बिन्दी लगती हैं...
उसके आने की आहट से खिल जाता है पूरा आंगन...
हाँ इसी लिए तो वो पायल भी पहनती है...
और हाँ किसी रानी से कम नही है...
पूरे घर को संभलती है...
हस कर सब कुछ सह जाती है...
पर कभी किसी को दुख नही देती है...
इसी लिए तो वो मुझे मेरी माँ की याद दिलाती है...
कभी - कभी वो खुद को भी भूल जाती हैं...
हैय्.. बला की खूबसूरत लगती हैं...
जब शर्माकर मुस्कुराती है...
अपने होंठो से कुछ न बोल कर...
आँखो से सब कुछ कह जाती है...
जिस तरह देखना चाहो तुमको नजर आयेगी...
ये तो एक लड़की ही कर पायेगी...
जब साडी पहन कर आती है तो बड़ी अच्छी लगती है...
मेरी माँ की बिल्कुल परछाई लगती है....
हाथो में कंगन भी पहनती है...
और फिर बिल्कुल माँ की याद दिलाती है...
बालों में गजरा लगती है..
जिसकी खुशबू से पूरा घर महकती है...
आँखो की हया को छुपाने के लिए...
आँखो में काजल लगाती है..
चाँद में भी दाग है.....
शायद इसी लिए माथे पर बिन्दी लगती हैं...
उसके आने की आहट से खिल जाता है पूरा आंगन...
हाँ इसी लिए तो वो पायल भी पहनती है...
और हाँ किसी रानी से कम नही है...
पूरे घर को संभलती है...
हस कर सब कुछ सह जाती है...
पर कभी किसी को दुख नही देती है...
इसी लिए तो वो मुझे मेरी माँ की याद दिलाती है...
कभी - कभी वो खुद को भी भूल जाती हैं...
हैय्.. बला की खूबसूरत लगती हैं...
जब शर्माकर मुस्कुराती है...
अपने होंठो से कुछ न बोल कर...
आँखो से सब कुछ कह जाती है...
जिस तरह देखना चाहो तुमको नजर आयेगी...
ये तो एक लड़की ही कर पाएगी।
