तलाश
तलाश
खुद की तलाश में, जब बाहर पड़े कदम
मालूम न था कि, राह भटक रहे हैं हम
खोज में खुद की, न जाने कहा गुम हो गए
चलते चलते हम, घर का रस्ता भूल गए
उलझन से भरी दुनिया, हैं एक भूलभुलैय्या
जुदा हुए जमाने से, तो खुदको है पाया
कौन कहता है कि, अकेलेपन में गम है
भीड़ में भिड़ रहे लोगों का, यह कितना बड़ा वहम है
काफिलों से बिछड़कर, कभी अकेले चलकर तो देखो
बाहें खोलकर कभी, जिंदगी से मिलकर तो देखो
खुदकी खूबियां और खामियां खुद को ही पता है
लेकिन जानना चाहते हैं जमाने से, यही हमारी खता है
गैरों को क्या पता, कि तुम कितने खास हो
किसी को हो न हो, अपने वजूद का खुदको एहसास हो
विचार तो सबका लेना, सुनो मगर अपने दिल की
क्यूंकि चलनी खुद ही को हैं, जो राह है मंजिल की
बस औरों का साथ पाने, न तुम अनचाही राह चुनो
अकेले ही क्यू न चलना पड़े, फिर भी हमेशा खुद की मानो
जब भीड़ में रहोगे, अपनी काबिलियत कैसे जानोगे
अकेले में ही तुम, अपने आप को पहचानोगे
फैसला जो भी हो तुम्हारा, सोच समझकर ही लेना
लेकिन एक बार जो ठान लिया, तो पीछे न हटना
उम्मीदों को खुद की, मेहनत के पंख लगाना
जो सोच मे न हो किसी की, तुम ऐसी उड़ान भरना।
