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अमित प्रेमशंकर

Romance

2.8  

अमित प्रेमशंकर

Romance

था सफ़र सुहाना वो

था सफ़र सुहाना वो

1 min
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था सफ़र सुहाना वो

मुझे देख रही थी मनचली।

थी कोई एक नूर जहां की

या कोई थी पुष्प कली।।


कहने की कुछ चाहत थी

पर जिह्वा न खोल सकी।

नज़रों से ही नज़र मिला के

दिल की बात को बोल गई।।


कहने को कुछ जी चाहा

पर मैं भी कुछ न बोल सका।

साहस मैंने ख़ूब किया

पर राज़ ए दिल न खोल सका।।


    



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