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Sumit Sancheti

Abstract Romance

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Sumit Sancheti

Abstract Romance

छोटी छोटी ख्वाहिशें

छोटी छोटी ख्वाहिशें

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ओस की कुछ बुँदे कांच की खिड़की पे लोटती में

कभी उंगलियों से लकीरे खींचताबनती बिगड़ती लकीरें,

उन्हें युही देखता कभी उन्हें बहने देताकभी लिखता कोई नाम,

कभी कोई चेहराऔर खुद में मुस्कुराताये

मुस्कुराते रहने की ख्वाहिशें।


खिड़की क परे चमकती बतियाकुछ धुंधली सी थी

उन्हें में यही ताकताकई सपने खुले,

दरवाज़ों से बहार झांकतेओस से बहते, भागते,

ना रुकते, ना टिकतेइन सपनो को पकड़ने की ख्वाहिशें। 


छोटी छोटी ख्वाहि सेगानों पे गुनगुनाते सफर करने की ख्वाहिशें 

पंजाबी गानों पे जी भर नाचने की ख्वाहिशें यारो संग दो घूंट लगाने की ख्वाहिशें 

आधी रात तक फिर संग बैठ गप्प सप्प लड़ाने की ख्वाहिशें 

मैदान में भागती तरंगो सीकिसी कविता क पंक्तियों की छंदों सी

लुभाती, मचलतीछोटी छोटी ख्वाहिशें।


शहर से अलग, इसकी जगमगाहट से दूरतारे देखने की ख्वाहिशें

सर्द रातो में, धुंद के आवास मेंबादल से आँखमिचौली खेलते,

चंदा के प्रकाश मेंमेरी बोली, तेरी हंसी तेरी हंसी,

मेरी बोली यूँ ही मन भर हंसने की ख्वाहिशें

छोटी छोटी ख्वाहिशें ओस की बूंदें सी ख्वाहिशें। 


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