तेरे बिना(मुक्तक)
तेरे बिना(मुक्तक)
हुआ मिथ्या कहना, कैसे जियूंगी तेरे बिना,
नही रह सकती, मर ही जाऊंगी तेरे बिना,
लड़खड़ाई, संभली, गिरी उठी औ' चल पड़ी,
देख तो सीख ही लिया है मैंने चलना तेरे बिना.
हैरत में हूँ क्यों लोग कहते है अधूरी तेरे बिना,
एक इम्तेहां है जिंदगी देना ही है जिसे तेरे बिना
जिएंगे वो भी जिनको मैं सहारा नज़र आती हूँ,
कहेंगे वो भी एक दिन देख जी रहे हैं तेरे बिना.
बड़े हो जाने का सबूत है, चलना तेरे बिना,
आ ही गया है दूसरों का सहारा बनना तेरे बिना,
सिर्फ़ दिलासा है जाने वाले के संतोष के लिए,
जीते हैं, हंसना भी सीख जाते है लोग तेरे बिना.
आज फिर से कहना पड़ा, नही रह सकती तेरे बिना,
सोचती हूँ, फिर निकल जायेगी मेरी जान तेरे बिना,
मेरी सारी भावनाएं, अभिव्यक्तियाँ तुझ से ही है,
रो ही जाऊंगी इस बार ऐ मेरी कलम, तेरे बिना.
