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Ajita Singh

Abstract

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Ajita Singh

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तेरा जाना

तेरा जाना

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इत्तेफ़ाक़न चले जाना, किसी मोड़ पे वाहिद

तेरा बिखरा हुआ, समेटने में सदियाँ लगती हैं।


कैसे जुड़ जाएँ, फिर से हम भी वाहिद

टूटे हुए को जुड़ने में, कई कड़ियाँ लगती हैं।


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