STORYMIRROR

Ajita Singh

Abstract

2  

Ajita Singh

Abstract

मौन

मौन

1 min
74

आकर ठहर जाता है तेरा मौन

जिसमें निहित है बाहरी कोलाहल

मेरे अंतर्मन की असीम पीड़ा.


बहुत व्यापक है तेरा "मौन"

यह चुभता है व्यंग्य और आक्षेप से

कई गुना ज्यादा.....


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Ajita Singh

Similar hindi poem from Abstract