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Rekha Bora

Abstract

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Rekha Bora

Abstract

तारों की साक्षी में

तारों की साक्षी में

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मुझे कई बातें कहनी हैं

तारों को साक्षी रखकर

चाँद से !


बातें. हाँ, कई जरूरी बातें

क्योंकि कल से तो

चाँद का चेहरा

विस्मृत हो जायेगा !


और फिर सम्बन्ध टूट जायेगा

मेरा और चाँद का !

पर डर लगता है

चाँद को जगाने की कोशिश

करते ही हाथ काँपता है !


गला रुंध जाता है

जब चाँद को पुकारने की

इच्छा होती है !


शायद

अब अंधकार की छूरी

गला काट देगी मेरा !


पर अब बिना शब्दों के

क्या कहूँ

क्या कहा !


चाँद फिर निकलेगा,

तब तक तो समय

चला जायेगा

कूद फाँद कर

शून्य वनों में विचरने !


फिर मैं क्या करूँ

क्या ढलते सूरज के साथ ढलूँ

सुबह होने तक।


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