स्वयं पकड़नी होगी मंजिल
स्वयं पकड़नी होगी मंजिल
बोला तो कभी यही था उसने कि
मेरा सब वक्त अब से तेरा परन्तु
बंट गया वक्त उसका सारा जमाने को
मेरे हिस्से तो बस उसके सारे बहाने आये
और मैं बेचारी उसमें ही उलझी रही
अब नही बचा सब्र मुझ मे जरा भी
अब वो आबाद रहे अपने बसाए जमाने मे
मैने तो अब तन्हा ही पकड़ी राह अपनी
उसका न अब रहा इंताजर मुझे मुसाफिर बन
चल पड़ी अपनी स्वयं की बनाई राह पर
अकेली आई थी "मंजु" मत घबराना कभी
ये तो मतलब के रिश्ते हैं जितने निभे निभाना
चलना होगा अकेले ही बस राह अपनी पकड़ना होगा
चल उठ और पकड़ मंजिल अपनी अपने लिए।
