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Pankaj Sharma

Tragedy

3  

Pankaj Sharma

Tragedy

सुफियाना इश्क

सुफियाना इश्क

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एक अफसाना जुदा जुदा सा


तुम्हारी आँखों की उदासी देख

महसूस किया मैंने

कि आज मुझे ये 

चारों ओर धूंध सी क्यों दिखती है


कितनी जल्दी हर लेती है

ये संगदिल दुनिया

आँखों में पनपती खुशबू को।


फिर मैंने झांकना शुरू किया

लोगों के भीतर तक

वहां इतनी भी तंग न थी गलियां

कि तेरी रौनकें बुरी लगें

कि तुझे स्वीकार न पाये।


और मैंने कुछ दीये 

हर चौखट को सौंपे

कि रोशन हो अंदर, बाहर

मन, मंदिर।


यूँ धीरे धीरे सब 

मंदिर की ओर बढ़े।

मैं तुझमें रब देखता रहा..

लीन होता रहा.. खोता रहा

समाता रहा


मीरा सा, मीर सा

अबीर सा, कबीर सा।

खो सा गया 

सूफियों में

सुफियाना इश्क में।


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