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सीमा शर्मा सृजिता

Abstract Inspirational

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सीमा शर्मा सृजिता

Abstract Inspirational

सुनो! योषिताओं

सुनो! योषिताओं

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सुनो! योषिताओं 

मायके की देहरी भीतर ही 

मत छोड़ आना सारे बचपने को

थोड़ा सा सहेज लाना 

भीगी आंखों में 

मेहँदी रचे हाथों में 

पैरों की पायल में 

सतरंगी आंचल में 

अपनी मीठी मुसकान में 

जब आओ ससुराल 

तो मिला देना उस बचपने को 

देहरी पर रखे कलश में 

ताकि बिखर जाये आंगन में 

चावलों संग

मिला देना परात में रखे लाल रंग में 

ताकि रंग जाये आंगन 

पैरों के निशानों संग

जरा सा मिला देना 

थाल में रखी उस हल्दी में भी 

ताकि छप जाये दीवारों पर 

हाथों संग 

बचा -कुचा स्वतः ही बिखर जायेगा 

जब तुम खिलखिलाओगी 

मासूम बच्चे की तरह 

उस आंगन में पहली बार

  

योषिता - स्त्री 


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