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Surendra kumar singh

Abstract

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Surendra kumar singh

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सुबह

सुबह

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सुबह तो मौजूद ही थी

पता था उसका,

अनुभूति थी उसकी,

रंगत तो थी ही उसकी।

पर सामने तो रात थी

घनी अमावस की रात,

नदी सी बहती हुई रात,

समुन्दर से गहरी रात,

पता नहीं था उसका।

चले सुबह की तरफ

जले रात भर

चढ़ते हुये पहाड़

लांघते हुये जंगल

नापते हुये रात की गहराई

अब जब सुबह आयी

लोग कह रहे हैं

सुबह हो गयी है।

पर उन्हें पता नहीं है

हमारे जेहन में,

रात अभी भी मौजूद है

अमावस की तरह।


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