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Dinesh Sen

Abstract

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Dinesh Sen

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सत्य

सत्य

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हर जुल्म की दवा हूं,

महकी सी सबा हूं।

तू लाख डाल मिट्टी,

मैं दबाए न दबा हूं।


आसान नहीं है सबका,

यूं साथ मेरे चलना।

मैं दक्षिणी अक्षांश की,

पछुआ पवन हूं।


न समेट सकोगे कभी मुझे,

न मान माप पाओगे।

मैं विस्त्रत धरा और,

मैं ही तो उजला गगन हूं।


अधेरे में जुगनू,

साहस से भरी हूं।

मैं काली कलम का,

बेदागिल कवि हूं।


न बदल सका कल मुझे,

न कल मैं बदल जाऊंगा।

न मिटाए मिट सकती,

मैं ऐसी छवि हूं।


मैं कल भी वही था,

मैं आज वही हूं।

मैं काला कालिख,

मैं ही बेदाग सफेदी हूं।


न सूखूंगी कभी,

मैं अनवरत नदी हूं।

तुम लाख बांध लो मुझे,

तुम लाख मुझे मोड लो।


कर लो अनंत कोशिशें,

जितना चाहो तोड मरोड लो।

मैं धरा से बह निकलूंगी,

पग पग में बसी हूं।


मैं सच हूं छिपा लो मुझे,

लाख पहरे डाल कर।

अंधेरे को चीर निकलूंगा,

मैं भोर का रवि हूं।


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