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Dinesh Sen

Others

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Dinesh Sen

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बसंती बयार

बसंती बयार

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वो बसंती बयार बैरन,

वक्त बे वक्त सता रही है।

और पिया गए परदेश ,

ये जालिम दिल जला रही है।


सरक रहा है पल्लू,

रेशमी रह रह कर।

पायल भी निगोडी,

परेशां करे जा रही है।।


ये खिली हैं न जो ,

सरसों पीली पीली।

तो वर्षों पहले लगी हल्दी,

बदन में महका रही है।


मैं दुल्हन सी सजी थी,

बजी थी शहनाई।

वो कोयल की कुहू कुहू,

से याद आ रही है।


झड़ गए पीले पत्ते मानो,

दुख के बादल छट गये हैं।

उगी नई आशाएँ जैसे,

कल के सपने सज गए हैं।


ये सरसराती हवा कानों में,

सजन की सांसें सुना रही है।

जा बैरन बयार कहना पिया से

उनकी याद आ रही है।


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