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स्त्री

स्त्री

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वह रोती है, बिलखती है

टूटती है, संभलती है

सुनती है ताने जमाने के

अपराध है उसका नि:संतान होना।


उसका पति जो बस

चार पैसे कमाता है

लौटता है घर आधी रात को

सारे पैसे शराब की

बोतलों में डूबोकर।


देता है उसे गालियाँ

और सुबह जब वो

कमरे का दरवाजा खोलती है

दिखते हैं उसके बदन पर

वो जख्म के निशान।


काले धब्बे..फूटे होठ..

और माथे पर निकले गोले

बयाँ करते हैं

बीती रात की जुबानी।


स्त्री तेरी ख़ामोशी

स्त्री तेरी कहानी...।।


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