STORYMIRROR

Anuja Manu

Abstract

4  

Anuja Manu

Abstract

स्त्री

स्त्री

1 min
360

यह कैसा प्रेम है जिसमे तुम मुक्त और मैं बंधी हुई हूं

तुम सतत बहते रहे पर अभी भी मैं ठहरी हुई हूं


यह कैसा प्रेम है जिसमे तुम स्वछंद और मैं

लोगों के बातों से डरी हुई हूं


यह कैसा प्रेम है तुम चाहो तो निकाल दो अपने जीवन से

और मैं उसमे ही बने रहने और संवारने में लगी हुई हूं


यह कैसा प्रेम है जिसमे तुम्हारा गुरूर भी स्वाभिमान

और मेरा वजूद भी एक अभिमान हो

आखिर यह कैसा प्रेम है ? 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract