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divya kesharwani

Drama Tragedy

0.6  

divya kesharwani

Drama Tragedy

सपना - आत्म सम्मान में मर जाऊं

सपना - आत्म सम्मान में मर जाऊं

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लोग कहते थे

तुझे बराबर का हक़ दिया

साथ खड़े होने का हक़ दिया

अपनी बात बोलने का मौका दिया

लेकिन आज भी

मैं पूछती हूँ,

मुझे सम्मान कहाँँ दिया ?

हक़ सारे दिए,

आत्म सम्मान कहाँँ मिला ?


आज भी हर गली,

हर रास्ते में डर है

हर मोड़ पर आते ही

सन्नाटे में किसी के न आने की प्रार्थना

डर का साया है।

कहाँँ है मेरा सम्मान ?


घर से निकलते ही बोले

मत जा डर है

कुछ बोलू़ंं तो बोला जाए,

शांत रह !

आप लड़का न बने !

मर्जी से जीने नहीं मिला

डर है

इज्जत का ख्याल रख

बाहर डर है

कहाँँ है मेरा सम्मान ?


बेड़ियों में ऐसी उलझी सोच

कि कपड़े से चरित्र और

चरित्र से कपड़े देखे

कहाँँ है हमारा हक़ ?

यही सम्मान है ?


मै मर गयी

लेकिन सपना

कभी पूरा न हुआ

मेरे आत्म सम्मान का सपना...!







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