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Madan lal Rana

Inspirational

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Madan lal Rana

Inspirational

सोच का फर्क

सोच का फर्क

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दुर्गम से दुर्गम रास्ते भी,

तय कर लिए जाते हैं,

मुश्किल से मुश्किल काम भी,

पूरे कर लिए जाते हैं।


नि:शक्त और पंगु मनुष्य भी,

जीने की कला जानते हैं,

फिर हम क्यों पछताते हैं,

फिर क्यों पीछे रह जाते हैं।


कारण, साधनों की कमी हो,

या खुद हमारी दुर्बलता,

बदनामी भी हमारी होती है,

हाथ भी मलते रह जाते हैं।


नीयत हो कुछ करने की,

तो साधन भी मिल जाता है,

जनून हो मंजिल छूने की तो,

रास्ते भी सिमट जाते हैं।


हौसला अगर साथ हो तो,

रूकावटें भी नहीं टिकतीं,

पाना हो चाहे जिसे,

खुद पास जैसे आ जाते हैं।


"कर्म प्रधान विश्व करी राखा",

को छोड़ शायद हम,

"होहीं वहीं जो राम रचित राखा",

पर ज्यादा तवज्जोह देते हैं।


पर दोनों ही बातें सही हैं लगतीं,

नदी के दो किनारों की तरह,

मिल कर साथ बहना पड़ता है,

तभी तो मंजिल पाते हैं।



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