संकीर्णता : एक चिरव्याधि...
संकीर्णता : एक चिरव्याधि...
अपने मन का द्वार सहर्ष खोलें...
बस अच्छा ही बोलें...
ये संकीर्णता तुम्हें बीमार कर देगी ;
अब तो सुधर जाइए...!
जब भी मुँह खोलें
तो बस शुभ-शुभ बोलें...!
दुसरों को कटु-कथा सुना-सुनाकर,
ज़रा ग़ौर फरमाइए,
क्या से क्या बन गए हैं आप...!!
परचर्चा-परनिन्दा बुरी बला है।
जो भी इसके मोहपाश में
बंदी होकर अपना सुधबुध खो देते हैं,
उनका विनाश-काल प्रारंभ होता है...
