Sudhirkumarpannalal Pratibha
Action Thriller
जीवन
के
संघर्षों
में
भी
मजा
तब
आता
है
जब
हार
भीतर
जीत
नजर
आए
दर्द
दवा
मायूस
आंखों
चमक
रिश्तों का कम...
प्रेम सर्वव्य...
प्रेम निशब्द
प्रेम
सही मायने में...
प्रेम और नफरत
अद्भुत बालक क्रूर दानवता की दुष्ट प्रवाह पर प्रहार शिवा सत्य सत्यार्थ।। अद्भुत बालक क्रूर दानवता की दुष्ट प्रवाह पर प्रहार शिवा सत्य सत्यार्थ।।
तुम्हें पता नहीं यारों, तभी तो फौजी कहलाता हूँ। तुम्हें पता नहीं यारों, तभी तो फौजी कहलाता हूँ।
ये ढूंढ रहे किसको जग में शामिल तो हूँ तेरे रग में, तेरा ही तो चेतन मन हूँ क्यों ढूंढे ये ढूंढ रहे किसको जग में शामिल तो हूँ तेरे रग में, तेरा ही तो चेतन मन हूँ क्य...
ख़ामोशी भी दिले यार का दिया तोहफ़ा होती है। सजा जैसी ज़िंदगी लगती है गर बात ना होती है ख़ामोशी भी दिले यार का दिया तोहफ़ा होती है। सजा जैसी ज़िंदगी लगती है गर बात न...
जिंदगी में गांठ तू बांध लेना कि हिम्मत हौसला है तेरा गहना। जिंदगी में गांठ तू बांध लेना कि हिम्मत हौसला है तेरा गहना।
मैं तुम्हारे वास्ते उस फौजी के टुकड़े चुन लाया हूँ। मैं तुम्हारे वास्ते उस फौजी के टुकड़े चुन लाया हूँ।
खटास और मिठास घुला जैसा स्वाद है मजेदार खट्टी मीठी गोलियां। खटास और मिठास घुला जैसा स्वाद है मजेदार खट्टी मीठी गोलियां।
जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश। जिसने नाम ना जपा, उसे है अफसोस, अंतिम सत्य रूप में, ले लेता आगोश।
बीत जाते है शादी के ये चार दिन नेग चार, बन्ना बन्नी में बीत जाते है शादी के ये चार दिन नेग चार, बन्ना बन्नी में
पहचान मुझे तुम क्या दोगे मैं ख़ुद अपनी पहचान हूँ, पहचान मुझे तुम क्या दोगे मैं ख़ुद अपनी पहचान हूँ,
चुप – चुप अम्मा मेरी रहती है लगता की सबसे वो रूठी है चुप – चुप अम्मा मेरी रहती है लगता की सबसे वो रूठी है
कौन कहता है कि गुलशन की जमीं उर्वर नहीं, कौन कहता है कि मेरा ये वतन कमजोर है। कौन कहता है कि गुलशन की जमीं उर्वर नहीं, कौन कहता है कि मेरा ये वतन कमजोर है।
नौजवानों इस वतन का कल है हाथों में तुम्हारे। नौजवानों इस वतन का कल है हाथों में तुम्हारे।
जिंदगी अपने सारे माँ भारती तेरे आँचल में ही मैं गुजार दूँ। जिंदगी अपने सारे माँ भारती तेरे आँचल में ही मैं गुजार दूँ।
कोई दवा मिलती ही नहीं, मैं रो पड़ता हूं। मैं लिखता हूं, मिटाता हूं। कोई दवा मिलती ही नहीं, मैं रो पड़ता हूं। मैं लिखता हूं, मिटाता हूं।
अब कृपा नहीं अधिकार चाहिये, मेरे वजूद पर ना उपकार चाहिये, अब कृपा नहीं अधिकार चाहिये, मेरे वजूद पर ना उपकार चाहिये,
तब हमें ऐसे महान दिव्यांग महापुरुष को पढ़कर सकारत्मक का ख्याल फिर से आ जाता है। तब हमें ऐसे महान दिव्यांग महापुरुष को पढ़कर सकारत्मक का ख्याल फिर से आ जाता है।
जब अचानक से लड़कियों की शिक्षा लेकर मची थी क्रांति और लोग बंद करने लगे थे जब अचानक से लड़कियों की शिक्षा लेकर मची थी क्रांति और लोग बंद करने लगे थे
अटल विचार है व्यवहार है जेठ की भरी दोपहरी के बिहारी प्रज्वलित मशाल है। अटल विचार है व्यवहार है जेठ की भरी दोपहरी के बिहारी प्रज्वलित मशाल है।
तीन कपड़ों में तुम्हें ब्याह कर लाए थे अपने होनहार बेटे के लिए तीन कपड़ों में तुम्हें ब्याह कर लाए थे अपने होनहार बेटे के लिए