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भारती गौड़

Romance

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भारती गौड़

Romance

समर्पण

समर्पण

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280

मैं बनूँगी सांझ और सुकून तुम्हारा

तपती दोपहरी की छाँव,

तुम्हारी थकी हुई देह के लिए

मैं बनूँगी बिछौना

तुम्हारी उलझनों की राहत मैं

तुम्हारे सवालों का जवाब मैं।

मेरे सारे समर्पण तुम्हारे लिए है प्रिये!


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