STORYMIRROR

yogita singh

Abstract

3  

yogita singh

Abstract

समझो मुझे तो अच्छा हो

समझो मुझे तो अच्छा हो

1 min
238

समझो मुझे तो अच्छा हो यूं

समझने वाले लाखों हैं

खौलते लफ्ज़ जुबा खामोश है

लफ़्ज़ लबों पे सीने में आग है

रूह निकलती नहीं जिस्म से

जिस्म मरने को तैयार है

चल रहे किसी डगर पर

पैरों को मंजिल की तलाश है

यूं तो दिखते है ना जाने कितने अपने

पर पता है मुझे

सब भेड़िए ओढ़े शेर की खाल है

और सुनो

हमे पता है हम नहीं किसी काबिल 

पर

तुम लायक नहीं हो हमारे

क्या इस बात का तुम्हे एहसास है.



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract