सियाचीन का नायक
सियाचीन का नायक
सरहद की उन वादियोंं में ,
जहांं जम जाती हैं सांसे
क्या वहां कोई इंसान जीता है?
क्या वहां कोई जीवन है?
हां सरहद की उन वादियोंं में,
जहां चलती हैं तेज हवाएं
छिपे- छिपे से बर्फीला वादियों में
खामोश रहती है फिजा ,
खामोश फिजा र्सद हवाएं ,
जैसे मार रही हो थपेड़े ,
बर्फीली वादियों में
हां बर्फीली वादियों में,
सोचो जरा ,
कैसे कोई यहां जीता है?
सरहद की इन वादियोंं में ,
जहांं जम जाती है सांसे
फिर भी कोई यहां जीता है
तान कर सीना अपना ,हर आलम में रहता है
मातृ-भूमी को शीश नवा, अपना र्फज निभाता है
चाहे चीन, तिब्बत हो या सियाचीन ,ग्लेशियर
वहां भी अपना फौजी भाई ,
तानशस्त्र में रहता है
मजबूत इरादे दिल में लिए,
अपना जीवन जीता है,
और अपना फर्ज निभाता है,
कोई खुशी नहीं ,
तो कोई गम भी नहीं चेहरे पर
न ईद , न दीवाली , न कोई मिठास
न कोई होली का रंग ।
फिर भी रंगीन रहता फौजी अपना
इस खामोश फिजा में ,
अपना फर्ज निभाता है ,
अपना कर्ज चुकाता है,
बिन सांसो की परवाह किये,
अपना कतर्व्य निभाता है
सच मानो आप ,
सरहद की उन वादियोंं में ,
जहांं जम जाती है सांसे
वही वो इन्सान है जो,
हर पल वहां जीता है,
और उस कठोर, खामोश फिज़ा में ,
अपना फर्ज निभाता है
नायक है वो सियाचीन का
हिमखंडो से टकराकर अपना लोहा मनवाता है।
