शिपाली
शिपाली
नन्ही-गुड़िया नाम शिपाली,
लिखने-पढ़ने की वह आदीI
विद्यालय से पढ़कर आती,
घर पर उसे पढ़ाती दादीII
विद्यालय से शिक्षा लेकर,
महा विद्यालय पढ़ने आईI
अनजानों का शहर समझकर,
पापा को वह साथ में लाई II
स्नातक की शिक्षा पाकर,
देश की सेवा की अब ठानीI
रखने को प्रशासन जन सुखदाई,
लोक प्रशासक बनकर मानीII
जहां जरूरत जिसको होती,
करने मदद वहां वह जातीI
निर्भय होकर सभी घूमते,
ऐसा वह निर्णय कर आतीII
एक दिन ऐसा संकट आया,
एक आरोप किसी ने लगायाI
खुली अदालत मध्य रात्रि में,
जज ने आरोपी उसे पायाII
खबर गई जब चौपालों तक,
सब ने न्यायालय को घेराI
झूठा है आरोप किसी का,
कहकर वहीं पर डाला डेराII
जज भी समझ गया सब बातें,
निर्णय फिर से लगा सुनानेI
रिहा हुई निर्दोष शिपाली,
जनता को जज लगा रिझानेII
कवि प्रताप की पक्व पंक्तियां,
कितनी किसको भाएंगीI
एडिटर मित्रों की टिप्पणी ,
देखो क्या रंग लाएंगीII
