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V. Aaradhyaa

Classics Fantasy

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V. Aaradhyaa

Classics Fantasy

सिँहवाहिनी हो आरुढ़

सिँहवाहिनी हो आरुढ़

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भगवती भवानी के समक्ष,

ना कोई ज्ञानी ना कोई मूढ़ !


पराक्रम रूपी सिंह पर,

ज़ब सिंवाहिनी हो आरूढ़ !


जीवन के कठिन संग्राम में,

खोले सफलता के भेद निगूढ़ !


यत्र तत्र सर्वत्र माँ की झलक,

चाहे भवानी समीप हो या दूर !


अन्याय पर न्याय की जय हो,

कालगति को प्राप्त हो असुर !


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