सिँहवाहिनी हो आरुढ़
सिँहवाहिनी हो आरुढ़
भगवती भवानी के समक्ष,
ना कोई ज्ञानी ना कोई मूढ़ !
पराक्रम रूपी सिंह पर,
ज़ब सिंवाहिनी हो आरूढ़ !
जीवन के कठिन संग्राम में,
खोले सफलता के भेद निगूढ़ !
यत्र तत्र सर्वत्र माँ की झलक,
चाहे भवानी समीप हो या दूर !
अन्याय पर न्याय की जय हो,
कालगति को प्राप्त हो असुर !
