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Karishma Gupta

Abstract

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Karishma Gupta

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शून्य

शून्य

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ताउम्र सुलझाया जाए तो भी क्या 

कुछ धागे फ़क़त होते ही उलझने की लिए।


मैं चला हमेशा जोड़ता हर हिस्सा 

कि हर बारी एक गांठ जुड़ती चली गईं।


अंत मै न गांठे और न धागे का उलझना चुभता है

चुभता है तो वह जो है मेरे अंतर्मन का परिवर्तन।


जिसमें अब शेष नहीं कुछ भी न प्रेम न द्वेष 

न अपेक्षा न प्रतीक्षा न हर्ष न विलाप।


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