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Mahendra Kumar Pradhan

Abstract

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Mahendra Kumar Pradhan

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शुक्रिया खुदा

शुक्रिया खुदा

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ऐ मेरे खुदा ! तुझे लाख लाख शुक्रिया

तूने मेरे अरमानों को आबाद कर दिया।


खोल के मेरे बंधन,तोड़ के बेड़ी जकड़न,

मुझमें आजाद परिंदों का उड़ान भर दिया।


जैसे बादलों के फिरने से हंसता है आसमान

मुझे फिराकर अपनों में उल्लास आनंद भर दिया।


मुक्त हवा में मदमस्त परिंदे लगा रहे हैं उड़ान,

मुझमें भी वो रंग लगाकर लाख एहसान कर दिया।


मुझ पर तेरे एहसानों को हजार सलाम मेरे खुदा,

अब अपनों से मुझको फिर कभी ना करना जुदा।


अगर जुदा हो जाऊं तो मुझे तुझमें समा लेना

तर जाऊंगा नाथ, इतना एहसान कर देना।


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