श्रीमद्भागवत -२९९ः सत्संग की महिमा और कर्म तथा कर्मत्याग की विधि
श्रीमद्भागवत -२९९ः सत्संग की महिमा और कर्म तथा कर्मत्याग की विधि
भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, “ उद्धव
जगत में आसक्तियाँ हैं जितनी
सत्संग नष्ट कर देता सबको
और यही कारण है कि।
सत्संग मुझे वश में करे जैसे
वैसा साधन और कोई नही
ना योग है, ना सांख्य
ना धर्मपालन, ना स्वाध्याय ही।
तपस्या, त्याग, , इष्टापूर्त्त, दक्षिणा से भी
प्रसन्न नही होता मैं वैसे
व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ, यम, नियम
सत्संग के समान वश में ना कर सकें।
एक युग की बात नही ये
ये बात है सभी युगों की
सत्संग के द्वारा ही दैत्य, राक्षस
पशु, पक्षी आदि को मेरी प्राप्ति हुई।
मेरा परमपद प्राप्त किया
इसी से बहुत मनुष्यों ने भी
वृतासुर, प्रह्लाद, बलि, बाणासुर
जटायु, गोपियाँ आदि ने भी।
सत्संग के प्रभाव से ही
प्राप्त कर सके हैं मुझे
ना महापुरुषों की उपासना की और ना
वेदों का स्वाध्याय किया उन्होंने।
सत्संग के प्रभाव से ही
मुझे प्राप्त हो गए सब वो
गोपियाँ, अधासुर, गोएँ, वृक्ष आदि
सर्वथा ही मूढ़ बुद्धि थे वो तो।
इन्होंने और बहुत सारे और भी
प्रेमभाव के द्वारा ही जिन्होंने
अनायास ही मेरी प्राप्ति कर ली
और कृतकृत्य हो गए।
उद्धव, अक्रूर जी जब व्रज से
बलराम और मुझे मथुरा ले आए
उस समय गोपियों का हृदय
रंगा हुआ मेरे ही रंग में।
मेरे वियोग में वो तीव्र
व्याधि से व्याकुल हो रहीं
और मेरे अतिरिक्त कोई भी
दूसरी वस्तु उन्हें सुखकारक नहीं।
तुम ये तो जानते ही हो कि
एकमात्र प्रियतम मैं उनका
बहुत सी रात्रियाँ हम साथ थे
जब मैं वृन्दावन में था।
आधे क्षण समान बीतती थीं उस समय
परंतु मेरे बिना रात्रियाँ वो ही
उन गोपियों के लिए वो
एक कल्प समान हो गयीं।
बड़े बड़े ऋषि मुनि जैसे
स्थित होकर समाधि में अपनी
तथा गंगा आदि नदियाँ जब मिलें
समुंदर में, अपना नाम रूप खो देतीं।
वैसे ही ये गोपियाँ सारी
परम प्रेम के द्वारा मुझमें
इतनी तन्मय हो गयीं थीं कि
पति, पुत्र, शरीर का भी ध्यान ना उन्हें।
बहुत सी तो ऐसी थीं उनमें
वास्तविक स्वरूप को ना जानती मेरे
समझती मुझे केवल प्रियतम ही
भगवान नहीं मानती थीं मुझे।
और जारभाव से मुझसे
मिलने की आकांक्षा किया करतीं
उन सैंकड़ों हज़ारों गोपियों ने
केवल संग के प्रभाव से ही।
साधनहीन होने पर भी
मुझ परबाह्म को प्राप्त कर लिया
इसलिए तुम भी सबकुछ त्याग कर
आश्रय लो मेरी शरण का।
समस्त प्राणियों के आत्म स्वरूप
मुझ एक की ही शरण ग्रहण करो
मेरी शरण में आकर तुम
सर्वथा निर्मल हो जाओ।
उद्धव जी ने कहा, “ परमेश्वर
सुन रहा मैं ये आत्म उपदेश तो
परंतु इस से मिट नही रहा
मेरे मन में बैठा संदेह जो।
सर्वधर्म का पालन करूँ मैं या
सब छोड शरण ग्रहण करूँ आपकी
कृपाकर भलीभाँति समझायीये मुझे
दुनिया में भटक रहा मेरा मन अभी।
भगवान श्री कृष्ण ने कहा
काष्ठ मंथन किया करते हम जैसे
वायु की सहायता से अत्यंत
सूक्ष्म चिंगारी प्रकट होती पहले।
और फिर आहुति देने से
प्रचंड रूप धारण कर लेती
शब्द ब्रह्मस्वरूप से ही
वैसे ही प्रकट होता मैं भी।
क्रमशः पश, पशयन्ति, मध्यम और
वैखरी वाणी के रूप में
इसी प्रकार बोलना, चलना, सूंघना आदि
सत्व, रज और तमोगुण के विकार सारे।
और कर्ता, कारण और कर्म
अभिव्यक्तियाँ हैं सब मेरी ही
इस त्रिगुणमय ब्रह्मकमल का कारण
है तो बस ये परमेश्वर ही।
एक था और अव्यक्त था
यह आदिपुरुष पहले तो
काल आदि की माया के आश्रय से
परमेश्वर अनेक रूपों में प्रतीत हो।
ओतप्रोत परमात्मा में विश्व ये
एकमात्र आश्रय वही इस संसार का
जैसे सूत बिना वस्त्र का अस्तित्व नही
किंतु सूत उसके बिना रह सकता।
वैसे ही जगत के रहने पर भी
रहता ही है परमात्मा
किंतु जगत परमात्मा स्वरूप ही है
कोई अस्तित्व नही उसके बिना इसका।
नित्य है संसार वृक्ष ये
मोक्ष और भोग फल फूल हैं इसके
बीज हैं पाप और पुण्य
वासनाएँ जड़ें, तीन गुण हैं तने।
पाँच भूत मोटी प्रधान शाखाएँ हैं इसकी
रस हैं शब्दादि पाँच विषय इसके
ग्यारह इंद्रियाँ इसकी शाखा हैं
जीव और ईश्वर दो पक्षी इसके।
घोंसला बनाकर वो निवास करें इसमें
बात, पित्त और कफ़रूप छाल है
सुख और दुःख दो तरह के
इस वृक्ष पर फल लगते हैं।
सूर्यमंडल तक फैला विशाल वृक्ष ये
इस सूर्यमंडल का भेदन कर ले जो
संसार के चक्र में कभी भी
मुक्त पुरुष नही पड़ते वो।
शब्द, रूप, रस आदि विषयों में
फँसे हुए हैं मनुष्य जो
कामनाओं से भरे होने के कारण
गीध के समान ही हैं वो।
इस वृक्ष का दुःख रूप फल भोगते
क्योंकि फँसे रहें कर्म के बंधनों में
जो परमहंस विषयों से विरक्त हैं
राजहंस समान सुखरूप फल भोगें।
उद्धव, वास्तव में मैं एक ही
रूप जो मेरा अनेकों प्रकार का।
मायामय है केवल ये
जो यह बात समझ है लेता।
समस्त वेदों का रहस्य जानता वो
और उद्धव, तुम भी ऐसे ही
गुरु की उत्तम भक्ति के द्वारा
कुल्हाड़ी तीखी करके ज्ञान की।
उससे काट डालो जीवभाव को।
फिर परमात्मा स्वरूप होकर ही
वृतरूप अस्त्रों को भी छोड़कर
स्थित रहो अखंड स्वरूप में ही।
