शंकर छंद
शंकर छंद
आशाऍं बन दीप जलेंगी,रखिए सुविश्वास ।
महक उठे फिर बगिया हिय की,रखो जी अनुवास ।।
आशाऍं बन दीप जलेंगी....
जन-जन को अब तुम जगाइए,जागरण सत्कर्म ।
रखिए परहित में आप सदा,देते सहज मर्म ।।
मिलता कैसे जग में देखो,राम को वनवास ।
धरिए जी प्रेम सद्भावना,शांत रखो पिपास ।।
आशाओं से फिर चमकेगा,बनकर चंद्रहास...
आशाऍं बन दीप जलेंगी....
