STORYMIRROR

Arunima Bahadur

Abstract

4  

Arunima Bahadur

Abstract

शायद हम समझदार न हुए

शायद हम समझदार न हुए

1 min
71

शायद हम समझदार नहीं हुए

 समझदारो की समझदारी के आगे

 हम सदा नासमझ ही हुए 

ना स्वार्थ की समझ न धन लोलुपता 


मन में तो है वही शीतलता

इस शीतलता से हम विभूषित हुए 

पर कभी हम समझदार ना हुए

प्रेम को मन में छिपाए 


खोजे खिलखिलाने के उपाय 

सदा बचपन की मुस्कुराहट लिए

पर कभी हम समझदार ना हुए

भूली बिसरी यादों संग 


खिलखिलाते पुष्पों के संग 

खुशियों का संसार लिए

पर कभी हम समझदार ना हुए

जग भुला पर हम ना भूले 


प्रकृति संग सदा हम खेले 

मुखड़ा विश्वास का लिए 

पर कभी हम समझदार ना हुए।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract