सबल
सबल
ये जो सितारे..जगमगा रहे हैं,
उन्हें जगाने वाले हम हैं
सुख- चैन के ..जो अनेकों साधन
उन्हें चलाने वाले हम हैं
अट्टालिकाओं की दीवारों में..
सजी जो ईंटें, तपाते हम हैं
हमीं से सारी..शान-ओ-शौकत,
सोचो जरा तुम, कहाँ न हम हैं ।
डिगे ना हम, कभी डगर से
बरसे मेघा,या आग हम पे
तैनात तत्पर, मिटाने तम को
रुके न तब से,चले हैं जब से
लड़ते हैं रण,करने पूरे सपने..
देखी जो आँखे,मेरे वतन ने
सुनहरा कल..सजाने वाले,
कल भी हम थे,कल भी हम हैं ।
अड़े जो हम,अपनी ज़िद पे
शिखर अकड़,पग में धूल खाये
कड़ी चट्टानों के दंभ हमसे,
टकराए तो फिर,माफ़ी न पाये
सुदूर गाँव में,चमकते जुगनू ..
उन जुगनुओं की चमक में हम हैं
रौशन घरों के..जब कोने- कोने,
समझ ये लेना, हम काम पर हैं ।
डरें कभी ना,चुनौतियों से
भूमि पे हों ..या हों भूमिगत
भले जटिल है,जवाबदेही
इरादा अपना,सदा है अविचल
रचते हैं गाथा हम पसीनों से..
हमारा हर दिन नया जनम है ।
सबल श्रमिक हम वसुंधरा के,
जगमग हिंदुस्तां,जब तलक हम हैं ।।
