साक्षरता
साक्षरता
अनपढ़ और साक्षर के बीच में
कैसी छिड़ी ये जंग
साक्षरता के विषय में लड़े वो
एक दूजे के संग
सुन सुन कर उनकी बातें देखो
सभी रह गये दंग।
साक्षर कहे मैं श्रेष्ठ हूँ
तुम्हें अक्षर ज्ञान नहीं है
अनपढ़ कहे केवल वर्ण ज्ञान ही
साक्षरता की पहचान नहीं है
शब्दार्थ के बल पर क्यों तुम
इतना उछल रहे हो
छोड़ी संस्कृति तजि मान मर्यादा
प्रतिदिन बदल रहे हो
काम काज न करके घर के
सुबह शाम टहल रहे हो
वेशभूषा भोजन रहन सहन बदला
अब व्यवहार बदल रहे हो
साक्षरता के लक्षण नहीं ये
किस दिशा में चल रहे हो
अनपढ़ की बातें सुनकर
क्रोध से साक्षर तमतमाया
कैसे अनपढ़ ने मुझको
ज्ञान का पाठ पढ़ाया।
साक्षर बोला-
पता वता कुछ नहीं तुमको
ऐसे ही धारणा बनाते हो
फैशन का कुछ ज्ञान नहीं
और मुझे अज्ञानी बताते हो
पशुओं संग रहते सारा दिन
पशु सी है सोच तुम्हारी
दो अक्षर जो पढ़ लिख,जाते
ज़िन्दगी बदल जाती सारी।
घी दूध तजकर तुम भी
बादाम छुआरे खाते
लेते पक्ष मेरा तुम भी
यूं ना आक्षेप लगाते।
उन दोंनो की बहस का जब
निकला ना परिणाम
हालाते बहस जान तब
प्रगट भये भगवान
प्रभु ने उन दोंनो को
अपने पास बिठाया
साक्षरता होती है क्या
विस्तार से था समझाया।
सही गलत बतलाये जो
बड़ों को सम्मान दिलाये जो
समाज का मान बढ़ाये जो
संस्कृति को फैलाये जो
दिलों में प्रेम जगाये जो
मुसीबत में साथ निभाये जो
साक्षरता कहलाये वो।।
