STORYMIRROR

Shravani Balasaheb Sul

Abstract

4  

Shravani Balasaheb Sul

Abstract

साकार हूँ मैं...

साकार हूँ मैं...

1 min
310

जिसमें डूबे है किनारे, फिर भी खाली खाली सी नदियाँ हूँ मैं

बाहर का रास्ता नहीं, ऐसी भूलभुलैय्या हूँ मैं


जो खुदसे ही बेखबर है, ऐसी कोई खबर हूँ मैं

कभी पल में जमी से आसमाँ छू लू, कभी जिंदगी भर का सबर हूँ मैं


धीमे धीमे सुलझ रही जो, खुद से बेगानी वह पहेली हूँ मैं

खुद ही से अंजान खुदकी, सबसे अच्छी सहेली हूँ मैं


लिख के बस लिफ़ाफ़े में कैद, ऐसे हज़ारों पैग़ाम हूँ मैं

रात दिन से तंग हैं जो, मजबूर सी वह शाम हूँ मैं


हर किसी की समझ से बाहर, एक नासमझ समझ हूँ मैं

कभी चिंगारी से ही सहम जाऊ, तो कभी अँगारों में भी सहज हूँ मैं


तूफ़ाँ हूँ पर तूफ़ाँ नहीं, तूफ़ाँ में तबदील हवा हूँ मैं

कभी सबब खुशी का, कभी खुद ही के लिए शिकवा हूँ मैं


जो सिर्फ बन्द आँखों से दिखे, निराकार सा वह आकार हूँ मैं

सोचूँ तो ज़रा अधूरी सी, समझूँ तो स्वयं में साकार हूँ मैं।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract