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Brahmwati Sharma

Abstract

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Brahmwati Sharma

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ऋतुराज बसंत

ऋतुराज बसंत

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आ रहा सुवासित सुगंध लेकर फिर से यह प्यारा ऋतुराज

कोयल की कुहु कुहु से फिर संगीतमय होगा यह संसार।


आयीउमंग मन मानस में ऐसी बासंती हुआ घर द्वार।

सरसों इठलाये पीत वसन में अवगुंठन से रही निहार।


द्रुम दल फूले आमों की बगिया से अमिया भरे किलकार

गेहूं चना जौ ज्वार की बाली विहस कृषक को रही पुकार।


पंचतत्व ने त्यागी अपनी विकराल दृष्टि और भीषण स्वरूप।

मंथर मंथर गति से चली आ रही ऋतुओं की रानी धर बसंती रूप।


होली के से रंग है बिखरे प्रकृति हुई जनमानस में एक रूप।

वीणा वादिनी मां सरस्वती का अवतरण हुआ ब्रह्मा जी के आशीर्वाद स्वरुप।


पाकर,वर ब्रह्म से बैठ कुंभकरण की जिव्हा पर किया स्वयं बलहीन।


आ रहा सुवासित सुगंध लेकर फिर से यह ऋतुराज,

कोयल की कुहु कुहु से फिर संगीतमय होगा यह संसार।


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