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Rishi Rai

Abstract

3  

Rishi Rai

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रोशनी सवाल की

रोशनी सवाल की

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कौंधती चौंधती रोशनी सवाल की,

खींच के निकालती है खाल हर मिसाल की,


अंधेरे पर्दों में छुप रहा था बार बार,

पानी की ओट लिए दिख रहा था आर-पार,


बोल पड़े शब्द जो निशब्द थे, निढाल थे,

टूट गए बिंब जो पर्वत विशाल थे,


ज्वाला सी जान पड़ी अग्नि मशाल की,

कौंधती चौंधती रोशनी सवाल की।


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