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Abhilasha Chauhan

Abstract

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Abhilasha Chauhan

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रिश्तों में बढ़ रही दूरियाँ

रिश्तों में बढ़ रही दूरियाँ

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रिश्तों में बढ़ रही दूरियाँ

झगड़े हैं नित होते

यंत्रों में उलझे-उलझे सब

खोए-खोए रहते।


कहीं चलाती बेलन पत्नी

कहीं चलता हथौड़ा

माथा पकड़े पति है बैठा

सब कुछ मेरा तोड़ा

बीन रहा टुकड़ों को रो कर

सोचे हम क्यों सहते

यंत्रों में उलझे-उलझे सब

खोए-खोए रहते।


कविता करती पत्नी बैठी

पति का ध्यान न आया

ऐसी डूबी काव्य-पाठ में

पति उसपर गरमाया

क्यों लाकर है दिया टुनटुना

पछताता यह कहते।

यंत्रों में उलझे-उलझे सब

खोए-खोए रहते।


पति-पत्नी के बीच बना वो

बात सुनें छुप-छुप के

घर-बाहर के सब काम रुके

सब यंत्रों में अटके

होती है बस नित तनातनी

धुन में अपनी बहते।

यंत्रों में उलझे-उलझे सब

खोए-खोए रहते।



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