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सीमा शर्मा सृजिता

Abstract Romance

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सीमा शर्मा सृजिता

Abstract Romance

रहस्यमयी आंखें

रहस्यमयी आंखें

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तुमसे जब भी मिलती तुम मुस्कराते 

ना जाने क्या देखकर 

मैं बार- बार पूछती 

तुम कहा करते,

रहस्यमयी हैं तुम्हारी आंखें 

खो सा जाता हूं 

दीवाना हो जाता हूँ 

जैसे ये कुछ कहती हैं मुझसे 

जानती हैं मुझको 

पहचानती हैं मुझको 

मैं हंसती और कहती 

जानती तो हैं 

इनमें बसे जो हो तुम 

खुला रखूं तो तुम्हें देखना चाहती हैं 

बंद करूं तो तुम्हें देखती हैं 

तुम हंस जाते इस बार 

मैं भी हंसती 

तुम देखते रहते मेरी आंखें 

मैं देखती तुम्हें खुद को देखता 

तुम्हारी आंखों में 

फिर तुम चले गये एक दिन 

न जाने कहां 

मैंने अपनी आंखों में देखा 

तुम यहीं थे 

मैं जब -जब आंखें बंद करती 

तुम्हें देखती 

मैं मुस्कराती 

मैं क्यों मुस्कराती

ये एक रहस्य है 

जो मैंने छुपा लिया दुनिया से 

तुम फिर मिले एक दिन 

मैंने ये रहस्य छुपा लिया 

तुमसे भी.....  



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