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Chandresh Kumar Chhatlani

Abstract

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Chandresh Kumar Chhatlani

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रावण

रावण

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दहन होता है पुतला जिसका

असत्य का प्रतीक बन

मर्यादा-पुरुषोत्तम से लड़ा

पर कहाँ तोड़ी मर्यादा?


क्रोध था बहन की दशा पर

तरंगित हुआ था मस्तिष्क

पर सम्मान किया उसने

तिनके के घूंघट का भी


राजनीति में निपुण था

वो ब्राह्मण-पुत्र था शक्तिशाली

वो शिव-भक्त शीश काट

पाया था शिव का भी स्नेह


तांडव स्त्रोत का रचियता

वो था कहीं कवि हृदय भी

स्वर्ण लंका और पुष्पक की

तकनीक का जो बना प्रणेता


उसके राज्य की राक्षसी भी

सीता की माता जैसी थी

और राम-राज्य में सीता को

राज्य-निकाला था मिला


अंतिम क्षण तक वो था विजेता

मृत्यु का जो ग्रास बना

स्वयं का भाई था कारण

जो बहन के लिए मरा


जो विभीषण बना राजा

वो भी था भाई शूर्पणखा का

कर्त्तव्य भाई का क्या निभाया

युद्ध विजेता ज़रा बताना


जीत होती है सत्य की सदा

असत्य रावण ने कब कहा

असत्य तो है पुतला असत्य का

जिसको है जलाया जाता


जीवित है असत्य सदा से

देख लें अपने हृदय में

कभी सत्य प्रयत्न करे तो

असत्य हावी हो जाता है...


जो जलाना है पुतले को

अपने हृदय का असत्य फूंके

राम-रावण को मिला कर

दोनों के अच्छे कर्म देखें

दोनों के अच्छे कर्म देखें ....


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