पुताई बेमानी सी
पुताई बेमानी सी
रक्ताभ आदित्य की उष्णता कम होती जाती ,
रंगे पुते चेहरों के जोश सी ।
काले बाल फेशीयल से खिंचे गाल ।
गुर्दे दिल का हाल नहीं बताते ।
लिफ़्ट ख़राब होने पर ,मंज़िल दो मंज़िल चड़ने में हाँफना ।
मेरी पोल खोल देता ।
काले बाल खिंचे गाल सीड़ी चड़ने में मदद नहीं करते
ज़रा सी भी नहीं ।
फिर भी बाहर बाहर सजने का यत्न रोज़ करता हूँ ।
बाहर निकला पेट और चेहरे पर किया पेंट ,
एकदम अलग अलग कहानी बताते ।
रंगे सियार सा , घंटो शीशे के सामने आत्ममुग्ध खड़ा रहता हूँ,
जवानी के झूठे अहसास को जीते हुए।
खंडहर इमारत की बग़ैर मरम्मत की पुताई जैसा ,
एक चमकीला सा , हांफता बदन रोज़ ढो रहा हूँ ।
