पथिक
पथिक
ये दुनिया मुसाफिरखाना है,
पथिकों का आना जाना है।
कुछ दिनों का यहाँ ठिकाना है,
ऐ पथिक! इक दिन तो यहाँ से जाना है।
किस बात का तुझे इतना अभिमान है?
माटी का तू तो इक पुतला है।
तेरे रंग रूप और काया को ,
ऐ पथिक! माटी में इक दिन मिल जाना है।
कुछ साथ तुझे नहीं ले जाना है ,
खाली हाथ तुझे इस जग से जाना है।
सब कुछ तुझे यहीं छोड़ जाना है।
ऐ पथिक! एक कफन में ही तुझे यहाँ से जाना है।
कितनों से मुँह तूने मोड़ा है,
अपनों का दिल तूने तोड़ा है।
इस बात को तू बिल्कुल भूल गया,
ऐ पथिक! इन्हीं के कंधे पे इस जग से तुझे जाना है।
झूठी दौलत तूने कमाई है,
झूठी शोहरत तूने यहाँ पाई है।
तूने की जो पाप की कमाई है,
ऐ पथिक! उसे यहीं रह जाना है।
जो जग में तेरे अपने हैं,
जिनसे सजाए तूने सपने है।
किसी को साथ न तेरे संग चलना है,
ऐ पथिक!अकेले ही तुझे यहाँ से जाना है।
है ईश्वर का नाम ही इक सच्चा,
जिसको ही तूने भूलाया है।
इस जीवन के फंदों से,
ऐ पथिक। उसे ही तुझे बचाना है।
छोड़ मोह माया और धन दौलत,
कर ईश्वर के नाम का तू स्मरण।
इस भवसागर रूपी दुनिया से,
ऐ पथिक! उसको ही तुझे पार लगाना है।
जप ले अभी भी वक़्त गया नहीं,
सुधर जा वक़्त अभी भी हाथों में है।
वर्ना अंत समय तेरा जब आएगा,
ऐ पथिक! तुझे खूब ही पछताना है।
