STORYMIRROR

Krupa Shah

Abstract

4  

Krupa Shah

Abstract

पता हैं तुम को

पता हैं तुम को

1 min
124

पता हैं तुम को,

कि भूल कर सब कुछ

जब मैंने तेरा साथ दिया..


उलझन तेरे पास बदी थी

मुश्किलों में मैं साथ खड़ी थी

हाथ नहीं तब छूटे थे

शब्द नहीं तब रूठे थे


पर तूने कैसा खेल खेला

खुशियों से जैसे मेल किया

ऐसे पीठ दिखा के भागे थे

जैसे रिश्ते ही अपने आधे थे


मैं भी खुशियां लेकर आयी थी

रौशनी साथ मैं लाई थी

पर तूने अच्छा काम किया

अँधेरा मेरे नाम किया


सब रिश्तों को तूने तोड़ दिया

अकेला मुझको छोड़ दिया

तुझको जो मैंने माना था

उन जज्बातों को मोड़ दिया।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract