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Niru Singh

Abstract

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Niru Singh

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प्रथम अनुभूति

प्रथम अनुभूति

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तेरा खुद में होने का वो, 

पहला एहसास होने लगा है।!

अब तो मुझे दुनिया की हर खुशी मिल गई। 


तेरा वो धीरे धीरे बढ़ना,

तेरे एक एक अंग को, 

महसूस करने लगी हूँ। 

तेरा दिल भी अब धडकने लगा है, 


मेरी साँसो से तेरी साँसे जुड़ने लगी है। 

तेरा इधर उधर डोलना गुदगुदाने लगा है। 

तेरा मुझमें होने का एहसास, 

अब तो दिखने लगा है। 


मिलेगी एक नई पहचान तुझ से, 

होगा मेरा भी नया जन्म तुझमें । 

बदलेंगे मेरे हाव भाव अब तो, 

अपने नखरे छोड़,अब तेरे नखरे उठाऊँगी। 


आँखों से खुशी को!

छलकने से कैसे रोकूँगी?  

उस पल मैं खुद को कैसे संभालूँगी? 

जब तू मेरे हाथो में होगा। 


सम्पूर्ण तो मैं तुझी से होउँगी !

तू मेरा ही तो अंश होगा, 

ए मैं खुद को कैसे समझाउँगी? 

 


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