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अंकित शर्मा (आज़ाद)

Abstract

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अंकित शर्मा (आज़ाद)

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प्रज्ञा

प्रज्ञा

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तुम गुल नहीं,

पर महक से अपनी

मेरा गुलशन सँवारती हो,


रंगों से भरी 

चंचल तितली भी नहीं

पर प्रेम के मधु पर

अपना जीवन वारती हो


तुम चांद भी नहीं

पर 

चांदनी सी

शीतल हैं 

बातें तुम्हारी

 

सागर भी नहीं तुम

पर मन के भीतर

कितनी गहरी

कितनी सुंदर


तुम घटा भी नहीं

पर बरस जाती हो 

सुकूं बनकर

अक्सर

मुझपर,


हां तुम खुदा ना सही,

पर 

कम उससे

बिलकुल भी नहीं


प्रज्ञा जी आपको बहुत बहुत प्रेम 

समय कम देने के लिए क्षमा प्रार्थी।


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