परिंदे
परिंदे
रख देना छत की मुंडेर पर
तुम थोड़ा दाना-पानी।
मुसाफिर इस नील गगन के
थककर जब रुक जाएंगे।
आएंगे छत की मुंडेर पर
जब थोड़ा सुस्ताने को
देखकर ख़िदमत वो अपनी
मन ही मन खुश हो जाएंगें।
तेरी भलमनसाहत देख
आपस मे वो बोलेंगे
नेकियाँ अभी भी ज़िदा हैं
धरती के बाशिंदों में।
