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अजय केशरी

Abstract

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अजय केशरी

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परिंदा

परिंदा

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उन्मुक्त गगन में उड़ने दो,

उड़ने दो इन परिंदों को !

आज़ाद हुए है पिंजरे से,

उड़ान अभी है नई-नई !


अभी वक़्त लगेगा उड़ने में,

सीख जाएंगे ये उड़ना फिर !

ज़रा देखो इनकी उड़ान को,

नहीं थकते हैं कभी उड़ने से !


इन्हें आसमान को छूने में,

नहीं डिगता इनका लक्ष्य कभी !

उड़ने दो इन परिंदों को,

नहीं पिजरे में अब क़ैद करो


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