पंथ, ग्रंथ और समाज
पंथ, ग्रंथ और समाज
प्रिय डायरी के लेखन क्रम में,
मन में आज ये आ रहे हैं ये विचार,
सामाजिक उन्नति को बने पंथ व ग्रंथ,
कैसे बनते नफरत की दीवार।
परिवर्तन के क्रम में- लोकहित में,
आदिकाल से जन्मे हैं नए-नए पंथ,
सामान्य -जन की सुविधा हेतु,
समय-समय पर लिखे गए हैं अनेक ग्रंथ।
मूल भाव अधिकतर परमार्थ ही था,
पर स्वार्थ ने मन में डेरा डाला,
कुछ नियम बनाते समय और कुछ,
संशोधन में डाला धूर्तता मसाला।
इन ग्रंथों में जो लिखा गया अलग समय पर,
उसके अर्थ का अनर्थ कर डाला,
खुद को बचाने- दूसरे को फंसाने हित,
जोड़-तोड़कर निज हित में अर्थ निकाला।
आपकी श्रेष्ठता सम्माननीय है पर,
दूसरे की हेयता के भाव ने सब गड़बड़ कर डाला,
हर गुणवान के गुणों का हो सम्मान,
हर अवगुण को झट पहचान जावे तुरत निकाला।
शुभता और दुष्टता का साथ-साथ होना,
शाश्वत सच है पहचान लें सब ही हम लोग,
अध्ययन करें नए पुराने ग्रंथों का विधिवत,
समाज को लाभ तो हो पर न ब्यापे कुछ रोग।
